पुस्तक प्रकाशित – मेरी कविता मेरे भाव

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पुस्तक प्रकाशित – मेरी कविता मेरे भाव

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पहली इक्यावन प्रतीयों के पैसे एक NGO ‘उत्साह’ को समर्पित है। कृपया इस लिंक से पढ़ें, पढ़ाएँ और बताएँ अपने अन्य मित्रों को।

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पापा, पिताजी

🙏 #पापा, #पिताजी 🙏

उनकी बातें अभी भी जवान हैं
मेरे पिताजी में पूरा हिंदुस्तान है ।
कई बार हवाओं को बदला होगा
बाबू जी ऐसी ही दास्तान हैं ।।

पिताजी, बाबूजी, अब्बा, पापा … ये शब्द अपने आप में शशक्ता के पर्यार्य हैं। इनके बारे में क़लम उठती है तो बस बहे जाती है। शब्द अपने आप जैसे गढ़े जाते हैं।

माँ के बारे में जब लिखता हूँ तो सबसे ज़्यादा भाव ममता, करुणा जैसे आलोकों से सने होते हैं।

परन्तु पापा के बारे में लिखना एक अलग शैली को जीवित करता है। पापा पुरातन भी लगते हैं और आधुनिकता से जुड़े भी।

परिवार का वो मुखिया जो अपने पुरज़ोर प्रयत्न, कष्टपूर्ण कर्म, अथक साहस के लिए हमारे जीवन में एक अद्भुत स्थान रखता है …. पिता कहलाता है।

मेरे नाम को पूरा करने वाला ‘surname’ क्या सिर्फ़ कोई शब्द है, क्या केवल एक खाने को भरने के कुछ वर्ण हैं … ना ना…मेरा नाम जो मैं जानता हूँ, मेरा काम जो मैं करता हूँ, मेरी शैली, मेरी लीपी, मेरे अंगीकार, मेरे जीवन का आधार, मुझे समाज से करने का व्यवहार … ये सभी अगर किसी से मिले हैं वह व्यक्ति, वह देवता, वह पुस्तक, उसके अध्याय, वह मेरा पर्याय मेरे पिताजी हैं।
🙏

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चुनाव 2019

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राम नवमी

दशरथ के घर जन्में, नवमी के दिन राजा राम
आओ ख़ुशियाँ ख़ूब मनाएँ, मन में मेरे आजा राम

तुलसी कहते बात ये की राम सत्य संसारा
राम नाम के दीप से अंतः बाहर उजियारा

राम नाम की लूट है, लूट सको तो लूट
श्री राम प्रभु ऐसा कर दो, मिटे गरीबी, भूख

वानर राज सुग्रीव संग, सेतु बाँध बजाया डंका
ध्वजा सत्य की फहराये, दुष्टों की जल जाए लंका

मन की शक्ति,ज्ञान मिले और सत्संगी मार्ग दिखा दो
मुझमें थोड़ा दीप जला दो,मुझको थोड़ा राम बना दो

दशरथ के घर जन्में, नवमी के दिन राजा राम
आओ ख़ुशियाँ ख़ूब मनाएँ, मन में मेरे आजा राम

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#पुलवामा

पूछ रहा है आज तिरंगा अपने मन की बात
कबतक स्वान घात करेंगे वीरों पर आघात
कबतक माँगे सूनी होंगी लिपटा देख सुहाग
कबतक गोदी से लुढ़केगा बेटा भारत मात

कबतक शांति दूत ही बनकर भारत रोष जताएगा
या अब सैन्य शक्ति दर्शाने दुश्मन देश भी जाएगा

समय नहीं अब इतिहासों में ख़ुद को शांत बताने का
समय यही है मोदी जी शिव का तांडव दिखलाने का

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माँ का स्वर्गारोहण

माँ बरसों से दूर था तुमसे
पर माँ है ग़ुरूर था मुझे
हालाँकि आँखें सीली रहीं
चाहे परदेस ही था
पर माँ है तसल्ली रही

माँ गोद में कुछ
ऐसे सुलाती थी
माँ लोरी गा
चंदा रात बुलाती थी

और चंदा एक खिलोना बन
जुगनू में घुस जाता था
मैं माँ के मस्से से खेल
रोते-रोते हँस जाता था

अब तू नहीं तो सब कुछ सूना है
मन का दुःख दुःख से दूना है
माँ तेरी यादों में रोती है ये
भिड़कि खिड़की, खुला आला
आधा बंद पुराना दरवाज़ा
और सोई नहीं ये चौखट कब से
घर के आँगन का हर कोना
मुँह फुलाए बैठा है तब से

रसोई सबसे ज़्यादा खाली है
पूछती है कहाँ मेरा माली है
चूल्हा जो भूला नहीं
पूजा की थाली, दिया सलाई
वो परात, हलवे की कढ़ाई
पीतल का पतीला, गहरा भगोना
सभी रूठे है, कैसे मनाऊँ
कैसे समझाऊँ, तुम्हीं कहो ना

और वो बाबूजी का मौन
उसके बारे में मैं
बात भी नहीं कर पाउँगा
अपने बिस्तर पर बैठे बैठे
आपकी तस्वीर ताकते हैं
उनका रंगहीन चेहरा
कोई गहरी पीड़ा दर्शता है
फ़िर भी हमें देखकर मुस्कुराते हैं
ऐसे ही शशक्त पिता कहलाते हैं

माँ आपकी पुच्ची और पुचकार
लाड़ में सना पल्लू, ममता वाला हार
निरंतर बहता अपार स्नेह, दुलार
और आपके हाथों का स्वाद जो चखा है
ये सब मैंने हृदय में संजो रखा है

अगले जनम माँ फ़िर मेरे
जीवन को हरा बनाना
माँ मुझे फ़िर बड़ा बनाना
अपनी लोरी गाना
माँ फ़िर चलना सिखाना
माँ मुझे फ़िर से
अपनी गोद में लाना

माँ आपके साथ बिताए
हर छण का आभार
माँ तुम्हें ख़ूब प्यार
माँ तुम्हें ख़ूब प्यार

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