थोड़ी देर रुका जीवन फिर से चलने वाला है

☁️ ⛅️ ☀️ 🌷
थोड़ी देर रुका जीवन फिर से चलने वाला है
थोड़ा संयम और सही ये संशय जाने वाला है

देखा है मैंने गमले में अंकुर नया फूटकर आया
अचेतन था दुबका अंदर वह जीवन बन आया
अंदर बैठा अंधकार में साँसों को संभाला होगा
जड़ को आस दिखाकर कितना समझाया होगा

एक पुराने पौधे पर फूल नया इतराया है
थोड़ी देर रुका जीवन फिर से चलने वाला है


देखो सूरज बादल से वह कब लड़ता है
जबतक बादल रहे सामने अंदर रहता है
कितना ओज भरा सोचो संयम रखता है
जैसे ही बादल छँटता फिर आ जाता है

ऐसे ही फिर नई धूप में जीवन दिखने वाला है
थोड़ी देर रुका जीवन फिर से चलने वाला है
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आने को तैयार जनवरी

देख दिसम्बर बूढ़ा होकर
गिनता अपनी रातें है
आने को तैयार जनवरी
चार दिनों की बातें है

कैलेंडर ने चुप्पी साधी
अंतिम साल महीने में
नयी रोशिनी लेकर बैठी
जनवरी अपने सीने में
उस कोने में साल है बैठा
ताके अपनी राहें है
देख दिसम्बर बूढ़ा होकर
गिनता अपनी रातें है


अंतिम साल महीना सिकुड़ा
बिस्कुट चाय की प्याली-सा
नया वर्ष है आने वाला
उसपर एक मलाई-सा
सर्द हवा में झूल रहा
कैलेंडर लटका सोच रहा
जल्दी गिनती गिनती कर लूँ
स्वयं दिसम्बर नोच रहा
आशाओं से बात करेंगे
उम्मीदों को गाते हैं

देख दिसम्बर बूढ़ा होकर
गिनता अपनी रातें है
आने को तैयार जनवरी
चार दिनों की बातें है
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बुझे हुए दीपों से पूछो

  बुझे हुए दीपों से पूछो 
                 कितने रोशनदान बनाए
  अंधेरे को दूर भगा कर
                 घर में कितने राम सजाए 

  लौ ने कैसे ठुमक-ठुमक कर
                देखा ख़ुद को जला रही थी
  आधी बाती बची हुई
                 तिरछी होकर बता रही थी
  एक बूँद जो तेल बचा था
                 गाथा अपनी आप बताए
   बुझे हुए दीपों से पूछो 
                 कितने रोशनदान बनाए|

  एक बुझे दीपक ने ऊपर 
                 सूरज का संकेत दिखाया
  हम सब दीपक जब जलते थे
                सूरज को जलता बतलाया 
  और रात की जाती पायल 
                दिन को दीपों की बात बताए
  बुझे हुए दीपों से पूछो 
                 कितने रोशनदान बनाए|

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रावण दहन

आज फिर से रावण जला दिया
स्वयं को दोबारा नया बना लिया।

अगले बरस तक कुछ और जोड़ लेंगे
पुराने बगीचे से कुछ नवीन तोड़ लेंगे
स्वयं को तराशना कठिन ही होगा
आसान बनाने को दशानन बटोर लेंगे।

कम से कम आज तो पावन बना लिया
मैंने आज फिर से रावण जला दिया।

मुझे राम चाहिए वनवास नहीं
मुझे तारे चाहिए आकाश नहीं
मुझे संयम चाहिए सन्यास नहीं
मुझे जीत चाहिए अभ्यास नहीं।

स्वयं को छुपाने का आचरण बना लिया
अरे मैंने आज फिर से रावण जला दिया।

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हिंदी दिवस

हिंदी को अपनाइए, ना समझें इसको बोझ
ऐसा एक निवेदन है, आग्रह और अनुरोध
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पेड़-पौधे

गमले या फिर ज़मीं कहीं
पौधों की है जगह वहीं
कबतक देर लगाओगे
और सोचना सही नहीं

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सतरंगी सपनें

सतरंगी सपनों को जैसे पलकों तले बिछाया है
और तुम्हारी मुस्कानों ने मुझको नया बनाया है

 

 

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जनतंत्र #TV live

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भिखारी और कर्फ़्यू

दो-तीन बार करवटें बदल चुका हूँ। एक बार अपना चार-पाँच इंच पैर भी अटपटे-से कम्बल से बाहर निकाल चुका हूँ। कान पर कुछ पतंगा चल रहा है जिसे फ़िर से हटाया है। शायद ये वही है जो पिछले कुछ घंटों में कई बार अपना हक़ जता चुका है।

खैर इतनी सारी सुगबगाहटों के बावज़ूद और सो भी कैसे सकता था।

आँखें खुलते-खुलते खुलने लगी हैं। तभी मेरे सर के पास रखी पानी की पतली लेकिन लम्बी-सी बोतल गिर गई। यही अंतिम सम्भावित ख़लल थी जो अपना काम अच्छे से पूरा कर चुकी थी।

रोशिनी अपनी दिशा ले रही है मतलब वो मेरे बदन को बुहाड़ना शुरू कर चुकी है। अब मैंने पलकों को पहले थोड़ा भींचा और हाथों को ऊपर खींचा। आँखें क़रीबन पैंतालीस डिग्री का कोण बनाते हुए अलसाई-सी खुलने लगी।

ऐसा लगता है सूरज महाराज आप मुझसे थोड़ा ही पहले जागे हो क्योंकि लाली काफ़ी है आपकी थाली में।

थाली से याद आया मेरे कटोरे में दो सिक्के पड़े थे और किसी की मेहरबानी के दस रुपय।

खड़े होते ही पता चल गया की बाएँ पैर की सूजन नेक-सी कम है लेकिन दाएँ की कल से ज़्यादा। ये तो तब जब कल पानी के हाथ से थोड़ा सहलाया था। किसी तरह से जूतों को फँसाया अपने बाँस जैसे पैरों में।

मेरे पास ले दे के एक बड़ा थैला है और एक छोटा। बड़े में कम्बल, एक पैज़ामा, उधड़ी बुशट, एक छोटी-बड़ी जुराब रहती है। और हाँ मेरा कोट भी जिसे पहनकर मैं आज इस दशा में भी स्वयं को लाटसाब समझने लगता हूँ।

बड़े थैले को दाएँ कंधे पे डाला और छोटे की लटकन पकड़ कर चल दिया। चलना ही जीवन है मेरा। कब से बस चलता जा रहा हूँ। दिन दीन-सा दिखता है और हर शाम किसी बोझ में दबती आदत-सी।

दो दिनों से छोटे थैले में एक बिस्कुट का पैकेट कुड़बुड़ा रहा था सो खोला तो निकले डेड़। खा तो लिया लेकिन कुछ पता नहीं चला। शायद मेरा पेट रसातल होता जा रहा है ऐसा सोच कर मन को भटकाया और आगे कदम घिसटने लगे।

पिछले कुछ दिनों की कहानी कुछ और ही है। सड़कों पर या तो मैं दिखाई देता हूँ या मेरी परछाइयाँ या फ़िर बड़बड़ाते कुत्ते।

वैसे हम बेघरों को कुछ देने का ज़िम्मा घरद्वार वालों का ही होता है। लेकिन वो ही नदारत हैं। जाने कहाँ गए वे सारे। पता नहीं कहाँ गया शहर का शोर। अब तो शहर में सन्नाटा ही चिल्लाता है।

ये चौराहा चुप है, चाय वाले की दुकान बंद है। पता नहीं कहाँ गया मोहनलाल – बेचारा देखते ही मुझ बेचारे को एक प्याली दे देता था। सब्ज़ी की दुकान के बाहर केवल दो सड़े आलू पड़े हैं। और ये बड़ी दुकान लम्बी-सी गाड़ी वाले साहब की है जो अपनी जेब से हफ़्ते में कई बार दो-चार रुपय फेंक देते थे।

तभी कहीं से किसी ने पीछे से आवाज़ लगाई – “ओ मंगू”

मेरे पैर काँपने लगे। भला इस बीयावान में सहसा कौन।
देखा तो एक पुलिस का सिपाही खड़ा था।

मैंने सिकुड़ते हुए जवाब दिया – “जी बाओ जी”

“अबे तू कहाँ चले जा रहा है, दीखता नहीं कर्फ़्यू है कर्फ़्यू” – सिपाही ने कहकर ज़मीन पर डंडा पीटा।

“जा भाग अपने ठिकाने पर, शहर में महामारी फैली है।
देखता नहीं सारे लोग अपने-अपने घरों में हैं।” – सिपाही बोलकर आगे चला गया।

“महामारी” मैंने तो आजतक हैजा या जरैया बुखार ही सुना था। ये ज़रूर कोई ख़तरनाक ही होगी तभी इस बालकों के विद्यालय के दरवाज़ों पर केवल कबूतर क़तार में बैठे हैं।

कुछ कदम आगे को बढ़ाए फ़िर सोचने लगा की – मैं कहाँ जाऊँ, मेरा तो कोई ठिकाना नहीं। मेरे पास कोई चारदिवारी नहीं, कोई परिवार नहीं। किसको बचाऊँ, कैसे बचाऊँ। बचाने की सोचूँ या खाना ढूँढने की। ना तो बड़ी गाड़ी वाले साब हैं, ना मोहनलाल चाय वाला और ना ही आते जाते दुआ लेने को लोग।

सिपाही कुछ महामारी की बात कर रहा था। उसका क्या करूँ? कैसे ख़ुद को बचाना है? मेरा ना घर और ना ही कोई ठिकाना है, ना परिवार और ना ही समाज में कोई भागीदारी।

सुना है लोग अपने घरों में अपने परिवार वालों के साथ हैं। – खुशनसीब होंगे वे…पर मेरा क्या… आज तो छोटे थैले में वो कुड़बुड़ाता बिस्कुट भी नहीं बचा….

सोचते सोचते चला जा रहा हूँ बस। आज शहर में केवल दो ही जन बचे हैं जिन्हें कोई काम का डर नहीं है, जिसे केवल एक दूसरे के साथ ही रहना है और वो है मैं और मेरी भूख।
तभी एक कोने पर पीपल के पेड़ के नीचे एक केला पड़ा मिला। शायद ऊपर वाले ने यही संजो रखा था आज के लिए।

भटकते-भटकते शाम हो गई। सोता शहर जैसे दोबारा सोने को है। मैंने भी फ़िर एक गली के नुक्कड़ का एक कोना ढूँढ लिया। फ़िर अपना बड़ा थैला नीचे गेरा और पसर गया।

सिपाही की बात अब भी गुंज रही है – “जा अपने ठिकाने पर”।

काश मेरा भी कोई घर होता, बच्चे होते, परिवार होता। मेरी भी कोई ज़िम्मेदारियाँ होती। फ़िर सहेजता अपने आप को, सम्भालता अपने अपनों को और सो जाता सिहरन में अपने घर की चारदीवारियों के बीच… अपनों के बीच…

©आशीष मिश्रा

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