Tag Archives: माँ कविता

ज़िंदगी से बात कर ले

बैठ जा कुछ ज़िंदगी से बात कर ले बात कर के ज़िंदगी को साथ कर ले रात भर लेटा तो था पर सोया नहीं है कल की भागमभाग में खोया कहीं है अपने जो थे वे आज़ नपने लग रहे … Continue reading

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माँ तुम

माँ तुम अलबेली, गंगा-सी पवित्र हो मन की जगमग ज्योति तुम हो, इत्र हो माँ तुम प्यारी, वो लोरी की थाप हो वेदों के मंत्रों की जैसे कोई जाप हो माँ तुम पहेली, सीपों के अंदर मोती हो मैं रोता … Continue reading

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आँसू

जो बात कहनी थी वो शायद हो गई। जब आँख से आँसू रुका ही नहीं।। आँसू निकल सारी क़वायद कर गए । मन के फफोले आँसुओं में सन गए ।। जब आँख का आँसू ढ़लकता गाल पर। दीखता है प्रेम … Continue reading

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जीवन चलता है

कुछ सपने बिकते मोती भाव, कुछ मोती सीप में रोते है । पतवार आप ही खेती नाव, अपने समीप जब होते है ।। यूँ तो कुछ हँसते भी होंगे, जब डगमग हो गिर जाते हो । कुछ चाल तेज़ हो … Continue reading

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माँ – मिला जो फ़िर उनसे आँखें भरी

मिला जो फ़िर उनसे आँखें भरी बिछुड़ा फ़िर उनसे नदी-सी बही कुछ दिन बिताए साए में उनके अब कैसे बिताऊँगा पता ही नहीं लड़खड़ाती चले वो लिए झुर्री नई अब भूलने लगी है किसी की कही जब चलने लगा पूछा … Continue reading

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कभी वो मुसाफ़िर

एक राह मुड़कर, वहीं आई है आख़िर जहाँ से चला था, कभी वो मुसाफ़िर कुछ था बदला, कुछ बदला नहीं जी कुछ तो खुला था, कुछ परदा वही जी देखा एक गाँव कुछ बचपन के पाँव मटकती-सी यादें बिछड़ों से … Continue reading

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याद है ये सफ़र कब शुरू हुआ था

याद है ये सफ़र कब शुरू हुआ था कब से वो हमसफ़र से बीत रहे हैं कौन-कौन दबे पाँव हमारे साथ चला था भला कितने क़दम साथ रहे हैं यूँ तो साथ अब भी चलती हैं टोलियाँ कुछ बदली-सी बोलियाँ … Continue reading

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रखे शब्दों को फूलों पर, यूँ ही गीत बना बैठा

है प्यार वही जो ढले नहीं मन की पीड़ा को मले नहीं दीपक जलता बिन तेल नहीं दरिया की मिट्टी बहे नहीं जो रूठ गया वो बीता मौसम बिखरे पत्ते, कब रोता शीशम कर पत्थर अरमानों को, गूँगी तश्वीर बना … Continue reading

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कुछ ऐसे ये होली मानते हैं हम 

मित्रों से ख़ुशी झूम जाते हैं हम  मिलकर ये होली मनाते हैं हम  गिलेशिकवे जो भी रहे साल भर  चलो हँसकर उन्हें भूल जाते हैं हम  कुछ ऐसे ये होली मानते हैं हम  तुम लगती प्रिये मलाई-सी आज  पकड़ी पिया … Continue reading

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